दौसा (लालसोट)। राजस्थान की समृद्ध लोकसंस्कृति में हेला ख्याल एक ऐसा लोकनाट्य और संगीत रूप है, जो अपनी अनूठी शैली, तात्कालिक रचनात्मकता और प्रतिस्पर्धात्मक प्रस्तुति के कारण विशेष पहचान रखता है। यह केवल एक गायन परंपरा नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता, काव्य-प्रतिभा और संगीत-कौशल का जीवंत मंच है, जहां कलाकार अपनी कला से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
क्या है हेला ख्याल
हेला ख्याल मूलतः “दंगल ख्याल” की एक विशिष्ट शैली है, जिसमें दो गायक दल आमने-सामने बैठकर संगीत के माध्यम से प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसकी सबसे खास विशेषता यह है कि एक दल द्वारा प्रस्तुत बंदिश के तुरंत बाद दूसरा दल उसी विषय या भाव पर नई रचना तैयार कर प्रस्तुत करता है।
यह तात्कालिक रचना (इंप्रोवाइजेशन) ही इसे अन्य लोकशैलियों से अलग बनाती है। इस प्रतिस्पर्धा में न केवल गायन, बल्कि चतुराई, भाषा कौशल और मंचीय प्रस्तुति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत हेला जाति के प्रतिभाशाली शायरों ने की थी, जिनके नाम पर इसे “हेला ख्याल” कहा जाने लगा। प्रारंभिक दौर में इसके विषय पौराणिक कथाओं, रामायण, महाभारत और लोकदेवताओं पर आधारित होते थे।
समय के साथ इस लोककला ने खुद को बदला और अब इसमें सामाजिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दे भी प्रमुखता से शामिल हो गए हैं। यही बदलाव इसकी लोकप्रियता का मुख्य कारण बना है।
दौसा जिले के लालसोट में आयोजित होने वाला हेला ख्याल दंगल इस परंपरा का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक मंच है।
यह दंगल पिछले 272 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा है।
गणगौर पर्व के अवसर पर इसकी शुरुआत होती है।
भवानी पूजन के बाद दंगल आरंभ होता है।
यह कार्यक्रम लगातार 36 घंटे तक चलता है।
इसमें 30 से 40 हजार श्रोता भाग लेते हैं।
यह आयोजन न केवल दौसा, बल्कि सवाई माधोपुर, जयपुर, टोंक और करौली सहित पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है। देश के विभिन्न राज्यों से भी लोग इसे देखने आते हैं।
रजवाड़ा काल में यह दंगल तेल की मशालों की रोशनी में आयोजित होता था। उस समय राजघरानों द्वारा तेल और अन्य व्यवस्थाएं की जाती थीं।
समय के साथ रजवाड़े समाप्त हुए और आयोजन की जिम्मेदारी स्थानीय जनता ने संभाल ली। बढ़ती लोकप्रियता के कारण 1961 से यह दंगल झरंडे चौक से जवाहर गंज सर्किल में स्थानांतरित कर दिया गया।
हेला ख्याल का आयोजन खुले मैदान में होता है, जहां—
गायक, जिन्हें “ख्यालीड़े” कहा जाता है, घेरे में खड़े होते हैं
बीच में “नौपत” वाद्य रखा जाता है
देवी स्मरण के साथ कार्यक्रम शुरू होता है
सभी कलाकार सामूहिक स्वर में “अजी ए हो!” का उद्घोष करते हैं
इसके बाद शुरू होती है संगीतमय प्रतिस्पर्धा, जो पूरी रात चलती है।
इस लोकशैली में उपयोग होने वाले वाद्य यंत्र इसकी पहचान हैं—
नौपत
ढपली
चंग
चिमटा
नांद
तुरही
मंजीरा, ढोलक, खरताल आदि
इनकी लय और ध्वनि हेला ख्याल को ऊर्जावान और आकर्षक बनाती है।
पहले इस दंगल में केवल 7 गायक मंडलियां भाग लेती थीं, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़कर लगभग 20 मंडलियां हो गई है।
प्रत्येक मंडली में 40–50 कलाकार होते हैं।
अब प्रस्तुतियां केवल धार्मिक नहीं रहीं, बल्कि इनमें शामिल हैं—
देशभक्ति
राजनीति पर व्यंग्य
सामाजिक समस्याएं
नैतिक मूल्यों का ह्रास
भ्रष्टाचार और आतंकवाद
इस परंपरा को जीवित रखने में कई कलाकारों का योगदान रहा है, जिनमें प्रमुख हैं—
कजोड़ीमल शर्मा, परमानंद डोम, रमेशचंद्र शर्मा, सत्यनारायण, बाबूलाल शर्मा, कन्हैयालाल, हजारीलाल ग्रामीण, लक्ष्मण गुर्जर, नंदकुमार पांखला, किशनलाल सैनी आदि।
विशेष रूप से हजारीलाल ग्रामीण का योगदान उल्लेखनीय रहा है, जिनके सम्मान में पुरस्कार भी शुरू किया गया है।
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हेला ख्याल दंगल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज को दिशा देने वाला मंच भी है।
सामाजिक समरसता का संदेश
देशभक्ति की भावना
संकट के समय जनजागरण
1962 के चीन युद्ध के दौरान भी इस मंच के माध्यम से सैनिकों का उत्साहवर्धन किया गया था।
हेला ख्याल राजस्थान की उस जीवंत सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
272 वर्षों से लगातार चल रहा लालसोट का यह दंगल न केवल लोककला का संरक्षण कर रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी कार्य कर रहा है।
यह परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि यह समय के साथ बदलते हुए समाज की आवाज बनकर उभरती रही है।
रिपोर्ट
उत्कर्ष
