सेवानिवृत्ति अंत नहीं, बल्कि जीवन के उस पड़ाव की शुरुआत है, जहाँ अनुभव फल बनकर समाज को और मधुरता प्रदान करता है।

—सेवा से साधना तक: शिक्षकों का भावभीना अभिनंदन

ज्ञान के दीप जलाने वाले, पीढ़ियों को संस्कारों से सींचने वाले गुरुओं के सम्मान में जब भावनाएँ शब्द बनती हैं, तब वातावरण स्वयं ही श्रद्धा से भर उठता है। ऐसा ही एक मार्मिक और गरिमामय क्षण उस समय साकार हुआ, जब उच्च प्राथमिक विद्यालय भैंसारा एवं प्राथमिक विद्यालय आयराखेड़ा प्रथम-द्वितीय के संयुक्त तत्वावधान में न्याय पंचायत नीमगांव के सेवानिवृत्त शिक्षकों के सम्मान में एक भावभीना समारोह आयोजित किया गया।

विद्यालय परिसर मानो स्मृतियों और संवेदनाओं का संगम बन गया था। हर चेहरे पर आदर, हर आँख में कृतज्ञता और हर हृदय में उन गुरुओं के प्रति सम्मान उमड़ रहा था, जिन्होंने अपने जीवन का अमूल्य समय बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को समर्पित कर दिया।मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी श्री गिर्राज सिंह गुर्जर के शब्दों ने इस अवसर को और भी अर्थपूर्ण बना दिया—”सेवानिवृत्ति अंत नहीं, बल्कि जीवन के उस पड़ाव की शुरुआत है, जहाँ अनुभव फल बनकर समाज को और मधुरता प्रदान करता है।

“विशिष्ट अतिथि ग्राम प्रधान श्री इंदल सिंह चौधरी ने भी शिक्षकों के योगदान को नमन करते हुए कहा कि उनकी तपस्या और परिश्रम ने गाँव के बच्चों को दिशा और संस्कार दिए हैं। यह सम्मान केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस तप, त्याग और समर्पण का है, जो वर्षों तक शिक्षा के मंदिर में निरंतर प्रवाहित होता रहा।

सेवानिवृत्त शिक्षक—श्री नेम प्रकाश सारस्वत, श्री किशन सिंह वर्मा एवं श्री हरे कृष्ण शर्मा—का फूल-मालाओं, साफा, शॉल और स्मृति चिन्हों से अभिनंदन किया गया, तब वह क्षण केवल सम्मान का नहीं, बल्कि भावनाओं के उफान का बन गया। मानो हर माला में आभार पिरोया गया हो, हर शॉल में स्नेह समाया हो और हर स्मृति चिन्ह में अनगिनत यादें संजोई गई हों।समारोह के बीच-बीच में स्मृतियों की सरिता बहती रही—कभी मुस्कान बनकर, तो कभी आँखों की नमी बनकर। यह विदाई नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुभकामना थी; एक ऐसे सफर की शुरुआत, जहाँ अनुभव मार्गदर्शक बनते हैं और स्मृतियाँ संबल ।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. अंजीव कुमार रावत ने सहजता और भावपूर्ण शैली में किया, जबकि स्वागत उद्बोधन आयुषी भटनागर एवं धन्यवाद ज्ञापन श्री प्रमोद गोयल ने प्रस्तुत किया ।

यह आयोजन केवल एक समारोह नहीं रहा, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का जीवंत उदाहरण बन गया—एक ऐसा पल, जो उपस्थित हर व्यक्ति के हृदय में लंबे समय तक सजीव रहेगा।–

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