
फागुन की मादक बयार जब अबीर-गुलाल की रंगीनी के साथ धरती पर उतरती है, तब ब्रजभूमि का वातावरण केवल उत्सव मय ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भावों से भी सराबोर हो उठता है। मंदिरों की घंटियाँ, चौपालों की रौनक, गलियों में गूँजते रसिया और लोकजीवन की सहज उल्लासपूर्ण अभिव्यक्ति—ये सब मिलकर ब्रज की होली को अद्वितीय बनाते हैं।परंतु बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में यह जीवंत परंपरा धीरे-धीरे सीमित होती प्रतीत हो रही है।
ब्रज संस्कृति के गहन अध्येता और लोक परंपराओं के मर्मज्ञ डॉ. रामकुमार उपाध्याय के विचार इस परिवर्तन को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।–
-ब्रज की होली : आध्यात्मिक लोकानंद का उत्सव ब्रज की होली को यदि केवल रंगों का त्योहार कहा जाए तो यह उसकी आत्मा के साथ न्याय नहीं होगा। यह उत्सव भक्ति, प्रेम और लोकजीवन के समन्वय का अनुपम उदाहरण है।ब्रज की सांस्कृतिक संरचना में होली लीला-स्मरण और सामुदायिक उल्लास का संगम है।मथुरा श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में श्रद्धा का केंद्र है।वृन्दावन रास-लीला की भावभूमि है।बरसाना राधारानी की नगरी के रूप में प्रेम का प्रतीक है।नन्दगाँव नंदबाबा की स्मृतियों से जुड़ा है।इन सभी स्थलों पर होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि भावानुभूति है—जहाँ रंग शरीर से अधिक मन पर चढ़ता है और भक्ति व श्रृंगार एक ही प्रवाह में बहते हैं।–
-लठमार होली : प्रेम का सांस्कृतिक अभिनय बरसाना और नंदगाँव की लठमार होली विश्वभर में अपनी विशिष्टता के लिए जानी जाती है। इसकी सांस्कृतिक व्याख्या प्रेम और परिहास की परंपरा में निहित है।यहाँ महिलाएँ प्रतीकात्मक रूप से लाठियों से प्रहार करती हैं और पुरुष ढाल से बचाव करते हैं। यह प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण की छेड़छाड़ का लोक-अभिनय है।इस परंपरा का संदेश स्पष्ट है—उत्सव में उल्लास के साथ मर्यादा और आत्मीयता भी बनी रहनी चाहिए।–
-रसिया : ब्रज का प्राण
-संगीत ब्रज की होली की आत्मा यदि रंग है तो उसकी धड़कन रसिया है। फागुन के दिनों में चौपालों, मंदिरों और गलियों में ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की ताल पर गूँजते रसिया सामूहिक आनंद का वातावरण रचते हैं।रसिया की प्रश्न-उत्तर शैली इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। एक मंडली गीत के माध्यम से प्रश्न उठाती है और दूसरी उसी छंद और लय में उत्तर देती है। यही शैली रसिया दंगलों को जीवंत बनाती है और उन्हें केवल संगीत नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम बनाती है।यह परंपरा सामाजिक समागम का भी माध्यम रही है—जहाँ पूरा गाँव एक साथ बैठकर लोकसंगीत के माध्यम से भावों की साझेदारी करता है।–

-हाथरस : रसिया परंपरा का प्रमुख केंद्र
ब्रज क्षेत्र में रसिया की समृद्ध परंपरा को सहेजने में हाथरस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व लोक कलाकारों द्वारा यहाँ इस शैली को संगठित रूप मिला और समय के साथ यह सांस्कृतिक पहचान बन गई।अटल टाल और लल्ला शाखा जैसे रसिया अखाड़ों के बीच होने वाले दंगल कभी सांस्कृतिक उत्सव का रूप लेते थे। पूरी रात चलने वाले इन आयोजनों में साहित्यिक सौंदर्य, संगीत और लोकजीवन की सहजता का अद्भुत संगम देखने को मिलता था।-

–अन्य सांस्कृतिक केंद्र
हाथरस के अलावा भी कई नगर रसिया परंपरा के सशक्त केंद्र रहे हैं, जैसेअलीगढ़अतरौलीकासगंजरायाइन क्षेत्रों के कलाकारों और अखाड़ों ने रसिया को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। केवल लोकगीत नहीं, बल्कि छंद और भाषा की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध परंपरा है।ब्रजभाषा की मधुरता, दोहा-चौपाई-सवैया जैसे छंदों का प्रयोग और श्रृंगार रस की प्रधानता इसे विशिष्ट बनाती है।संगीत की दृष्टि से भी रसिया अत्यंत सशक्त है—गायक और वादक के बीच तालमेल, लय की दृढ़ता और प्रस्तुति की सहजता इसे लोकसंगीत की उच्च परंपराओं में स्थान देती है।—बदलता समय और चुनौतियाँ आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल माध्यमों के विस्तार ने रसिया को नई पहचान तो दी है, पर सामूहिकता का स्वर कमजोर हुआ है।जहाँ पहले दंगल सामाजिक जीवन का केंद्र होते थे, वहीं अब कई स्थानों पर वे औपचारिक या सीमित हो गए हैं।इसके साथ ही कुछ जगहों पर साहित्यिक शुद्धता और मर्यादा में कमी भी चिंता का विषय बन रही है। परंपरा का मूल भाव—सौंदर्य, भक्ति और शिष्ट हास्य—बचाए रखना आज सबसे बड़ी चुनौती है।—
संरक्षण की दिशा में आवश्यक कदम
इस लोक धरोहर को जीवित रखने के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं—शैक्षणिक संस्थानों में लोकसंगीत पर शोध को बढ़ावासांस्कृतिक महोत्सवों में रसिया दंगलों को मंचयुवाओं को ब्रजभाषा और छंद का प्रशिक्षणस्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारीयदि शिक्षित युवा वर्ग इस दिशा में आगे आता है तो यह परंपरा पुनः अपने उत्कर्ष की ओर बढ़ सकती है।-
–व्यापक सांस्कृतिक संदेश
ब्रज की होली और रसिया का मूल संदेश प्रेम, समरसता और सामूहिक आनंद है।यह परंपरा सिखाती है कि उत्सव केवल बाहरी रंगों का नहीं, बल्कि संबंधों को रंगने का माध्यम है।रसिया के स्वरों में जो अपनत्व है, वही ब्रज की सांस्कृतिक आत्मा है—जहाँ भेदभाव से ऊपर उठकर मनुष्य प्रेम के रंग में रंगता है।डॉ. रामकुमार उपाध्याय के विचारों से स्पष्ट होता है कि ब्रज की होली और रसिया केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक-आत्मा की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इन्हें केवल स्मृतियों में सुरक्षित न रखें, बल्कि चौपालों, मंचों और नई पीढ़ी के जीवन में पुनः स्थापित करें।तभी फागुन की वह रसमय धारा, जो सदियों से ब्रजभूमि को जीवंत करती आई है, आने वाले समय में भी उतनी ही सजीव और अर्थपूर्ण बनी रहेगी।—
रिपोर्ट
उत्कर्ष नारायण


